About Novelist, Poetess, Public Speaker

My photo
I like to live the Dream of mother teresa. I pray to Lord give me strength to help less poor and less fortunate youth, kids, women and humans of all ages

Thursday, January 14, 2010

सात समुन्दर पार - लेखक कमलेश चौहान . समीक्षा टिल्लन Richairya के कलम से

भाव, भाषा और संप्रेषण के नज़रिये से कृति का प्रवाह काफी सहज है । कृति के सृजन में कृतिकार का मन्तव्य अपना स्पष्ट संदेश व्यक्त करता है ।जिस परिवेश को उपन्यास का विषय चुना गया है उस पर बडी गहरी पैठ का अहसास होता । कई जगह तो ऐसा लगता कि कोई एक ही है जो विविध किरदारों में बोल रहा है । जैसे कोई एक ही है जो कई किरदार जी रहा है । यह कौन हो सकता है सिवा लेखक के ।

दरअसल हर किरदार अपने सर्जक का ' मानस चरित ' होता है । उसके सद-असद को वही जीता है --उसके प्रसव और विसर्जन को वही जीता है --लेखक ने अपने सारे किरदारों को मानस में बखूबी पाला हैं फिर कागज़ पर अवतरित किया है ।

भारतीय संस्कार और विदेशी परिवेश ---अजब-गजब हालात , तरह-तरह के मोड़ कहीं टूटने विवशता तो कहीं सब स्वीकार लेने के ललक --पर अन्दर के टीस के विविध पड़ावों का भरपूर जायजा लिया गया हैं ' सात समन्दर पार ' में ।

सात समन्दर पार …औरतें हों या लड़कियाँ ---विवशता के दर्द भारी गठरी लिये घूमती हैं --होठों पर मुस्कान भले ही हो पर अंतस में अपमान और बेबशी है ।बाबजूद इन सबके ---ये औरतें खालिस हिन्दुस्तानी हैं ।---तन से बेशक मैली पर मन से गंगा धुली ---इन औरतों को सलाम !--- इन औरतों की आत्मा और अंतरात्मा को कलाम की नोक पर जिन्दा रखने वाले कमलेश की कलाम को सलाम !

भाव, भाषा और संप्रेषण के नज़रिये से कृति का प्रवाह काफी सहज है । कृति के सृजन में कृतिकार का मन्तव्य अपना स्पष्ट संदेश व्यक्त करता है ।जिस परिवेश को उपन्यास का विषय चुना गया है उस पर बडी गहरी पैठ का अहसास होता । कई जगह तो ऐसा लगता कि कोई एक ही है जो विविध किरदारों में बोल रहा है । जैसे कोई एक ही है जो कई किरदार जी रहा है । यह कौन हो सकता है सिवा लेखक के ।

दरअसल हर किरदार अपने सर्जक का ' मानस चरित ' होता है । उसके सद-असद को वही जीता है --उसके प्रसव और विसर्जन को वही जीता है --लेखक ने अपने सारे किरदारों को मानस में बखूबी पाला हैं फिर कागज़ पर अवतरित किया है ।

भारतीय संस्कार और विदेशी परिवेश ---अजब-गजब हालात , तरह-तरह के मोड़ कहीं टूटने विवशता तो कहीं सब स्वीकार लेने के ललक --पर अन्दर के टीस के विविध पड़ावों का भरपूर जायजा लिया गया हैं ' सात समन्दर पार ' में ।

सात समन्दर पार …औरतें हों या लड़कियाँ ---विवशता के दर्द भारी गठरी लिये घूमती हैं --होठों पर मुस्कान भले ही हो पर अंतस में अपमान और बेबशी है ।बाबजूद इन सबके ---ये औरतें खालिस हिन्दुस्तानी हैं ।---तन से बेशक मैली पर मन से गंगा धुली ---इन औरतों को सलाम !--- इन औरतों की आत्मा और अंतरात्मा को कलाम की नोक पर जिन्दा रखने वाले कमलेश की कलाम को सलाम !

_टिल्लन रिछारिया / प्रबन्ध सम्पादक : एनसीआर टुडे

1 comment:

  1. Thanks Tillan .. Hum garib lekhak agar jinda hai to aap samachar patar se jinda hai.

    ReplyDelete