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I like to live the Dream of mother teresa. I pray to Lord give me strength to help less poor and less fortunate youth, kids, women and humans of all ages

Sunday, March 28, 2010

Dance of Wounded Tigress in Love --Kamlesh Chauhan C@ Kamlesh Chauhan

Dance of Wounded Tigress in Love
Kamlesh Chauhan

My Soul Care free soul unaware of the world of Love shore

Walking, Dancing, Singing, Chatting silently in small pond

I spoke of tenderness while hiding some disappointments

I spoke of gentles after hiding the harsh reality of providence


I wanted a connection only with my own soul

I was unrevealed, veiled about my heart hole

Hunter came through the crack window of my heart

I was fanatical, find appealing jingle of his love song

Hunter made me his own, drenched in my bone

His love put my body in flame, my heart was in Blaze


I kept him like a rope of pearl, prized gem in my Neck

I danced without feet, couldn’t break the love bond

I was fevered with the intoxication without fault

Truth, Love, Honesty language was in his text


One the Harsh reality of life occurrence called

Their hand in hand joy walks along the pond

Unaware he set his eye on someone else too

I was just his mere joy of his wander heart


I cried, I shouted, I screamed with agony

I was lost in terrible pain ask for mercy

Tears eyes for him was just water salty

I danced all alone with my own agony


All rights reserved in Poetry book " Memoirs Journey" nothing will be allowed to manipulate its contents or changed in any way.

Monday, March 22, 2010

...हम रूठना भूल गये--- लेखक: कमलेश चौहान---2005

सदियों तक तेरी मीठी याद की गुलामी करती रही
तेरी यादो नै बांध के रखा, संगदिल; में उलझी रही

ना जाने कॉलेज के एक बगीचे में खामोश खड़ी थी
तू जाते जाते रुका तेरी चेहरे पर मस्त ख़ुशी सी थी

मेरी जुल्फों को कभी मैकदा और काली घटा कहा था
मेरी झुकी नज़रो से मे ना जाने तू क्या खोज रहा था

मै़ने तुमसे नज़ारे भी ना मिलायी बस बुत बनी खड़ी रही
तुम मेरे पास आऐ लेकिन अपनी जुबा ना खोली थी

बरसते भीगते मौसम मे आज भी धुवा उठता है
तरसती आँखों मे आज भी एक नज़ारा बसता है

सदियों तक तेरी याद के सहारे बैठी रही
निगाह दूर तक तेरी राह सदियों देखती रही

खो गए वोह लम्हे रह गया द्शते-जुनू-परवर वहा
ना जाने तू मेरी दुनिया, ना जाने तेरी बसती है कहाँ


all rights reserved @ Kamlesh Chauhan 2009






Written about 6 months ago · Comment ·LikeUnlikeUmesh Bawa Arora, Neeraj हर मौसम आया हर मौसम गया
हम भूले ना आज तक कोई बात
हम भूले ना तेरा पियार
दिल ने माना तुम्हे ही दिलदार
तेरा हमारे रूठने पे यह कहना

भल्ला लगता है तेरा मिजाज़ चुलबला
जब हमारा किसी से बात करना
सुना करते थे तुमसे ही तुम्हारे दिल का डरना
हम पूछते थे कियों करते हो हमारे प्रेम पे शक
जवाब था तुम्हारा भरोसा है मुझ पर
नहीं करता मेरे दिल नादाँ पे कोई शक

लेकिन यु आपका हमारे आजाद पंछी दिल को कैद करना
हमारा दिल समझ न सका आपका इस कदर दीवाना होना
जब आई तुम्हारी बारी पराये लोगों से यु खुल कर बात करना
हम सोचते आप भी सीख जायोंगे प्रेम दोस्ती मे अंतर करना
हम खुश होते तुम सीख रहे हो गैरो से दोस्ती करना
हमारे दिल की कदर करोगे क्या होता है समाजिक होना
यह क्या हुआ यह कै़से रुख बदला तुमने अपना

गैरो की बातो मे हकीकत पाई तुमने हमारी वफ़ा भूल गए
मौसम भी कुछ वक़त लेता है बदलने में
सर्दी गर्मी घडी लेती है रुत बदलने में
यह किस कदर रास्ता हमारा भूल गए

इतनी जल्द कियों रंग बदल गया तुम्हारा
नियत ने बदसूरत किया चेहरा तुम्हारा
हम बैठे रहे दहलीज़ पर तेरी इंतजार मे
बिखरा दिये राहो की बेदादगरी ने
जो फूल बिखारे थे मेरे हाथो ने

जब रूठ कर माँगा हमने अपना हक
बरसा दिये तुमने अंगार भरे लफ्ज़
आंखे रोई पर ना सोयी रात भर
तेरी ख़ुशी पे भटका था मेरा सफ़र

वोह नज़र बरस जाती थी हमारी याद में
अब ज़हर है कैसा तुम्हारी उस नज़र मे
वोह तुम ना थे जो आंसू चुराए तन्हाई के
मालूम ना था बरस गया है धुआ कब से

तेरी बेरुखी से यह अशक निलाम हो गये
मेरे अशकों से तेरी यादो के दिये बुझ गये
तुझे क्या पता औ बेवफा अंग है बर्फ मेरे
ना आयुंगी कभी तेरे दर पे बुलाने तुझे

तेरी राहो से अब काफिले दूर हो गये
कौन करे दुवा तेरे मिलने की
हम रूठना भूल गये
Written by: Kamlesh Chauhan copy right 2005
this composition is in form of story and poetry.Please nothing should be exploited or manipulated. allrights reserved .

Saturday, March 13, 2010

Khuda ka Paigam Ensaan Ke Naam

खुदा का पैगाम इन्सान के नामShare
Saturday, August 22, 2009 at 4:43pm | Edit Note | Delete
खुदा का पैगाम इन्सान के नाम

लेखक कमलेश चौहान
कॉपीराइट २००८ @ कमलेश चौहान

चाँद को चादनी का तौफा दिया है है उस खुदा ने
सूरज को बनाया दिन का ताज उस ईश्वर ने

इन्सान के लिये बनायीं थी मालिक ने एक ही ज़मीं
जमीं के लिये गिराई इन्सान ने अपनी ज़मीर

मसीहा भी मेरा नाम, अल्लाह भी रखा मेरा नाम
राम रहीम एक है जान, कबीर करीम का है यह पैगाम

मत काटो सर मासूमो के मेरे कश्मीर मे लाकर मेरा नाम
मेरी ही बख्शी ज़मीं पी, मासूमो का मंगाते हो बलिदान

जिहाद तो बनाया था अपने अंदर के कुफर से लड़ना
शत्रंज़ , शराब और मन की बुराईयों से ज़ंग करना

लेकिन अब मै कया कहूँ , कोई मानता नहीं मेरा इमाम
मेरे ही प्यारो ने कर दिया ,मेरा ही नाम बदनाम


यह
ख्याल मै़ने तब लिखा था जब कश्मीर मे हमारे भारती लोगो के घर उजाड़ दिये थे हमारे पडोसी भाईयो ने. दुनिया खामोश रही लेकिन जो हमारे भारती नारियो , बचो और शंतिप्रियाए आदमियों को अपने ही वतन मै जिहाद और आज़ादी के नाम पर नफरत से कतला आम किये गया , भाईयो से बहने बिशद गयी और दुसरो हिसो मे बैठे भारती चुपचाप देखते रहे. आज भी हमारी भारती सरकार विशव मे यह नहीं साबित कर पाई की हमारा भारत धरम के नाम पर अपने देश के टुकडे नहीं कर सकता. धरम यह नहीं सकता किस्सी से बैर करना.